बाल संस्कार

स्वामी विवेकानंद

श्रुतम्-39

दूसरों के कष्ट वही दूर कर सकता है जो स्वयं कष्ट उठाने के लिए तैयार हो

स्वामी विवेकानंद और उनकी गुरु माँ शारदा से जुड़ी घटना है । विदेश यात्रा पर जाने से पहले विवेकानंद माँ शारदा से अनुमति और आशीर्वाद लेने पहुंचे । उन्होंने माता से कहा , ‘ मां , मैं संसार के दुःखों को दूर करना चाहता हूँ । मैं बड़ी यात्रा पर जा रहा हूं । आप मुझे आशीर्वाद में कोई ऐसी सीख दीजिए , जो विश्व कल्याण के उद्देश्य में मेरे काम आ सके ।

‘ माँ शारदा बहुत ही सहज और दूरदर्शी थीं । वे उस समय रसोई का काम कर रही थीं । उन्होंने विवेकानंद की बातें सुनी और रसोई घर में रखे हुए एक चाकू की ओर इशारा करते हुए कहा- ‘ मुझे वह चाकू उठाकर दे दो ।’ विवेकानंदजी ने जैसे ही चाकू उठाकर माता को दिया तो माँ शारदा बोलीं , ‘ मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है ।

मैं ये जान चुकी हूँ कि तुम संसार की सेवा अवश्य करोगे । यह बात सुनकर विवेकानंद विस्मित थे । उन्होंने कहा , ‘ मां , सिर्फ चाकू उठाकर देने से आपने ये कैसे जान लिया कि मैं संसार की सेवा कर पाऊंगा ? ‘

मां शारदा बोलीं , ‘ तुमने जिस ढंग से चाकू उठाकर मुझे दिया , उससे ही मैं ये बात समझ गई हूं । ‘ विवेकानंदजी ने चाकू के धार वाले हिस्से को खुद की ओर करके पकड़ा और हत्थे की ओर से मां शारदा को चाकू दिया था ।

मां शारदा ने कहा- “तुम्हारा यह आचरण दिखाता है कि तुम स्वयं कष्ट उठाने के लिए तैयार हो तो निश्चित ही दूसरों के कष्ट दूर सकते हो ।”

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