बाल संस्कार

 हमें तेजस्वी बनना होगा

*श्रुतम्-190*

 *हमें तेजस्वी बनना होगा*

सारे संसार को अगर हमें नवजीवन देना है।

हम चाहते हैं कि संसार हमारी बात माने तो इसकी सबसे पहली शर्त है- *हमें तेजस्वी बनना होगा।*

 

सिद्धांत कितने ही सच्चे और अच्छे हो लेकिन तेजोहीनाें की कोई बात नहीं मानता और न कोई सुनता है । यदि सुनें भी तो उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

हम जानते हैं कि स्वामी विवेकानंद का संसार के ऊपर जो प्रभाव पड़ा है उनके कपड़ों या स्मरण शक्ति का नहीं था। उनके एक-एक शब्द के पीछे जो श्रद्धा, त्याग, सेवाभाव, इंद्रिय-जय, गुरु भक्ति करुणा आदि बातें थी उनके कारण उनके मुख से निकले साधारण शब्द तेजस्वी एवं प्रभावशाली बनते थे।

स्वामी जी कहते थे- ” *मुझे केवल 100 तेजस्वी युवक चाहिए। सिंह की छाती के युवक चाहिए, उतने मिल जाए तो मैं भारत की सारी दीनता दूर कर उसे देदीप्यमान कर सकता हूं।”*

 

*भारत की वर्तमान दशा आज भी युवकों की तेजस्विता का आह्वान कर रही है।*

उस चुनौती को स्वीकार करने वाले असंख्य वीर आज चाहिए। तेज की उपासना करने वाले, तपस्या करने वाले, कम बोलने वाले, उद्यम शील, कर्तव्य दक्ष, सेवाभावी वीर चाहिए।

उनके अलौकिक जीवन यश से भारत का जीवन तेजस्वी बनेगा और उसके आलोक में सारा संसार सन्मार्ग गामी होगा।

*असतो मा सद्गमय।*

*तमसो मा ज्योतिर्गमय।* *मृत्योर्माऽमृतं गमय।*

ऋषियों की इस वाणी को हमें नित्य ह्रदय में धारण करना है। अज्ञान रूपी अंधकार से बाहर निकल कर हमें ज्ञानरूपी तेज को अंगीकृत करना है। बुरा छोड़कर अच्छा लेना है। चारों और आज जो मृत्यु का तांडव दिखाई दे रहा है उसे रोककर हमें समग्र संसार पर अमृत सिंचन करना है।

*उसके लिए हमें अपने जीवन को सात्विक, ध्याननिष्ठ, दृढ़ निश्चयी, स्वाभिमानी अर्थात तेजस्वी बनाना होगा।*

 

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