बाल संस्कार

 हिंदू चिंतन में प्रकृति भोग्या नहीं बल्कि जीती जागती माँ है

*श्रुतम्-173*

 *हिंदू चिंतन में प्रकृति भोग्या नहीं बल्कि जीती जागती माँ है*

भारतीयता या हिन्दुत्व  का अर्थ ही है-हरी-भरी वसुंधरा और उसमें लहलहाते फूल, गरजते बादल, नाचते मोर और कल-कल बहती नदियां। यहां तक कि भारतीय संस्कृति में वृक्षों और लताओं को देव-तुल्य माना गया है। जहाँ अनादिकाल से इस प्रार्थना की गूंज होती रही है- ‘हे पृथ्वी माता तुम्हारे वन हमें आनंद और उत्साह से भर दें।’

पेड़-पौधों को सजीव और जीवंत मानने का प्रमाण भारतीय वाङ्मय में विद्यमान है।

वेदों में पर्यावरण को अनेक तरह से बताया गया है, जैसे- जल, वायु, ध्वनि, वर्षा, खाद्य, मिट्टी, वनस्पति, वनसंपदा, पशु-पक्षी आदि। जीवित प्राणी के लिए वायु अत्यंत आवश्यक है। प्राणी जगत के लिए संपूर्ण पृथ्वी के चारों ओर वायु का सागर फैला हुआ है।

 

ऋग्वेद में वायु के गुण बताते हुए कहा गया है- *’वात आ वातु भेषजं मयोभु नो हृदे, प्रण आयूंषि तारिषत’*

 

‘शुद्ध ताजा वायु अमूल्य औषधि है, जो हमारे हृदय के लिए दवा के समान उपयोगी है, आनंददायक है। वह उसे प्राप्त करता है और हमारी आयु को बढ़ाता है।’

 

ऋग्वेद में यही बताया गया है- कि शुद्ध वायु कितनी अमूल्य है तथा जीवित प्राणी के रोगों के लिए औषधि का काम करती है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आयुवर्धक वायु मिलना आवश्यक है। और वायु हमारा पालक पिता है, भरणकर्ता भाई है और वह हमारा सखा है। वह हमें जीवन जीने के योग्य करें। शुद्ध वायु मनुष्य का पालन करने वाला सखा व जीवनदाता है।

 

वृक्षों से ही हमें खाद्य सामग्री प्राप्त होती है, जैसे फल, सब्जियां, अन्न तथा इसके अलावा औषधियां भी प्राप्त होती हैं और यह सब सामग्री पृथ्वी पर ही हमें प्राप्त होती हैं।

 

अथर्ववेद में कहा है- ‘भोजन और स्वास्थ्य देने वाली सभी वनस्पतियां इस भूमि पर ही उत्पन्न होती हैं। पृथ्वी सभी वनस्पतियों की माता और मेघ पिता हैं, क्योंकि वर्षा के रूप में पानी बहाकर यह पृथ्वी में गर्भाधान करता है। वेदों में इसी तरह पर्यावरण का स्वरूप तथा स्थिति बताई गई है और यह भी बताया गया है कि प्रकृति और पुरुष का संबंध एक-दूसरे पर आधारित होता है।

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