बाल संस्कार

हिंदू राष्ट्रीयता का सूत्र ही भारतवर्ष का उद्धार कर सकता है

*श्रुतम्-151*

*हिंदू राष्ट्रीयता का सूत्र ही भारतवर्ष का उद्धार कर सकता है।*

1915 से 1925 तक उनके 10 वर्ष देश में चलने वाले अनेक आंदोलनों और संस्थाओं के निरीक्षण अध्ययन और विश्लेषण में तथा राष्ट्र की बीमारी का अचूक निदान खोजने में बीत गए । हमारी मातृभूमि हिंदुस्तान न केवल भूमि, क्षेत्रफल, जनसंख्या, सृष्टि सौंदर्य, खनिज-संपत्ति उर्वरता में अपितु तत्वज्ञान धर्म, संस्कृति, इतिहास, पराक्रम, विद्वता, कला और कौशल्य आदि हर एक बात में कभी भी दुनिया में पिछड़ी ना रही, फिर किस राष्ट्रीय दुर्गुण के कारण यही प्राचीन हिंदू राष्ट्र अधोगति के गड्ढे में धंसता ही जा रहा है, सदा यह प्रश्न डॉक्टर जी के मन को पीड़ित किया करता था। डॉक्टर जी की विवेचक बुद्धि को इस प्रश्न का कहीं भी समाधान प्राप्त नहीं हुआ इसलिए वे स्वयं ही इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने में तन्मय रहते थे।

मातृभूमि की गुलामी के कारण निरंतर जलने वाला उनका मन विदेशी सत्ता को देखकर उद्विग्न हो उठता था सन 1920 की नागपुर की कांग्रेस के बाद के उनके सार्वजनिक भाषण अत्यंत उग्र और संपूर्ण स्वतंत्रतावादी हुआ करते थे। 1929 में जब सरकार ने उन पर मुकदमा चलाया तब कोर्ट में अपने कार्य का समर्थन करते हुए जो भाषण उन्होंने दिया वह निर्भीक और मुंहतोड़ इस नाते से प्रसिद्ध है। 1920 के पहले गरम दल की राजनीति में और सन् 1921 के असहयोग आंदोलन में उन्होंने आवेश व जोश से भाग लिया अनेकों संस्थाओं का निरिक्षण परीक्षण किया ।

उनकी विचारधारा में यह सिद्धांत बहुत दिनों से स्थान प्राप्त कर चुका था कि हिंदुत्व ही भारत का वास्तविक राष्ट्रीयत्व  है, वे अच्छी तरह जानते थे कि हिंदुस्थान आज गुलाम राष्ट्र है और उसका पतन चरम सीमा को पहुंच चुका है फिर भी उनके ह्रदय में इस श्रद्धा का पौधा बड़ी तेजी से बढ़ रहा था कि अंत में हिंदू राष्ट्रीयता का सूत्र ही इस पतित भारतवर्ष का उद्धार कर सकेगा।

उन्होंने यह दोहरा कार्यक्रम निश्चित किया कि एक और तो समाज में जागृति  उत्पन्न करने का कार्य अखंड चालू रखा जाए और दूसरी ओर जिन जिन समाज घटकों की आंखें खुल चुकी है उन्हें अभेद्य संगठन के रूप में पिरोया जाए। इस प्रचंड राष्ट्र धर्म कार्य की जिम्मेदारी उन्होंने स्वयं स्फूर्ति से अपने सिर पर ली और इसी कार्य में अपना सारा जीवन बिताने का अपने मन में संकल्प किया। अंत में उन्होंने यह निश्चय किया कि परिस्थिति चाहे जितनी विपरीत हो मुझे जिस कल्पना की स्फूर्ति मिली है उसे कार्य रूप में परिणत मुझे ही करना चाहिए और इसी कड़ी में  संवत् 1971 की विजयदशमी के शुभ मुहूर्त में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बीजारोपण किया।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *