बाल संस्कार

हिन्दू संस्कृति में परिवार की संकल्पना

श्रुतम्-74

हिन्दू संस्कृति में परिवार की संकल्पना और वर्तमान में उसकी आवश्यकता

शब्दकल्पद्रुम कोष में “हीन दूषयति इति हिन्दुः” सूत्र मिलता है | अर्थात् जो हीन भावनाओं को पाप समझकर, उसका परित्याग करता है, वह हिन्दू है | वैदिक संहिताओं में वर्णित इन्द्रादि सभी देवता हिन्दुओं के ही हैं, सभी मंत्र हिन्दू संस्कृति और आचार-विचार के संवर्धक तथा नियामक है | वहीँ, “परिवार” सभ्य सांस्कृतिक आवश्यकता की एक ऐसी संस्था है, जो आज भी भारतीय समाज की सशक्त पहचान बनी हुई है | आधुनिकता, शहरीकरण, पश्चिमीकरण और स्वतंत्रता के अति आग्रह के बावजूद आज भी व्यापक भारतीय समाज परिवार और संयुक्त परिवार संस्था का समर्थक है | बड़े-बड़े औद्धयोगिक घरानों ने भी हिन्दू अविभाजित संयुक्त परिवार संस्था में अपने परिवार और उद्योगों की स्थिरता, प्रगति और सम्पन्नता का आश्वासन देखा है | इन परिवारों के कार्यों, जिम्मेदारियों और उपलब्धियों की आवंटन की व्यवस्था में भी संयुक्त परिवार की वरीयता क्रम के प्रति सम्मान के विधान को भी अपनाया है | राजनीति, व्यापार, व्यवसाय आदि में संकट की स्थिति में परिवार ही भावनात्मक सहारा बनता है | सामान्य परिवार में भी प्रत्येक सदस्य को शारीरिक, मानसिक, आत्मिक और आर्थिक सहयोग मिलता है और जीवन के विषम और तनाव भरी स्थितियों में मनोवैज्ञानिक टूटन से उबरने का भावनात्मक संबल भी परिवार से मिलता है |

परिवार जीवन को प्रश्रय देने के साथ बच्चे के जन्म के साथ ही अनुभव और ज्ञान प्रदान करने की प्रथम पाठशाला बन जाता है | स्पर्श, रस, गंध, रूप और ऊष्मा का संज्ञान तो शिशु को माता की गोद से ही मिलता है | इस प्रकार, जन्म लेनेवाले प्रत्येक शिशु का पञ्च इन्द्रियों और पञ्च तत्वों या पदार्थों से प्रथम परिचय परिवार से ही प्राप्त होता है | काल-क्रमानुसार परिवार ही उसे आचार-व्यवहार के विभिन्न रूपों का प्रथम प्रशिक्षण भी प्रदान करता है | परिवार में संस्कार और व्यवहार के बीजों का आरोपण भी शिशु को उसके जन्म के साथ ही मिलने लगता है | परिवार के सदस्यों के आचरण और व्यवहार उसके आचरण की दिशा के निर्धारक बनाते हैं | घर से बहार की पाठशाला की अक्षर ज्ञान वाली शिक्षा की भूमिका परिवार ही तैयार करता है | व्यक्तित्व निर्माण का जो क्रम परिवार से प्रारम्भ होता है, वही व्यक्ति के भविष्य के स्वरुप का आधार बनता है |

किसी भी परिवार का आधार उसकी मातृशक्ति पर निर्भर करता है और हमारे पूर्वजों ने मातृशक्ति का वर्णन करते हुए कहा है कि :-
“राष्ट्रस्य सुदृढा शक्ति, सामजस्य च धारिणी |
भारते संस्कृते नारी, माता नारायणी सदा ||”
अर्थात्, भारत की नारी शक्ति का श्रोत है, जो राष्ट्र को सुदृढ़ करती है तथा समाज को धारण करती है और देवी माँ की भांति सदा-सर्वदा उनका पालन-पोषण एवं संस्कार करती है |

लेकिन द्वतीय विश्वयुद्योत्तर आर्थिक दबाबों के कारण संयुक्त परिवार एकल परिवार के तरफ बढ़ गया है | फलतः झूठे सम्मान के लिए, लालच अथवा भोग हेतु अपनों पर की जानेवाली हिंसक या अप्रिय घटनाएँ सामने आती हैं | मैकाले शिक्षण व्यवस्था जहाँ “Time is Money” का फिलोसफी दे लोगों को “Economical Instrument” बना दिया, वहीँ दादी-नानी की बोधप्रद कहानियां Out dated हो गई और बड़ों के प्रति Generation Gap का जुमला उछालकर उन्हें कुंठित किया जा रहा है | किसी परिवार का युवा अथाह धन सागर में डूब धरातल से ऊपर है तो कोई निर्धन युवा धनाभाव की कुंठा से ग्रस्त है, और दोनों ही स्थितियां परिवार-घातक बन रही हैं | पश्चिमी सभ्यता का अँधाधुंध अनुकरण में बढ़ रही सामाजिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक समस्यायों का गंभीर और घातक रूप लेने से पहले बौद्धिक और कलात्मक प्रतिभाओं का भावनात्मक रक्षण जरूरी है, क्योंकि परिवार केवल एक छत के नीचे बसने का नाम नहीं वरन आचार, विचार और व्यवहार की अनुशासन व्यवस्था है, जहाँ परस्पर सम्मान और सौहार्द्र का एक अलिखित विधान लागू रहता है | भारतीय संयुक्त परिवार व्यवस्था एक आदर्श हिन्दू परिवार व्यवस्था है जिसमें धन अर्जन में लिप्त युवाओं या माता-पिता को अपने आश्रितों के लिए चिंता न करने की निश्चिंतता देती है और बच्चों को एक-दूसरे से आत्मीयता के अदृश्य तंतु से मजबूती से बांधे रखती है |

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