बाल संस्कार

तात्या टोपे

*श्रुतम्-138*

तात्या टोपे

हम सभी के लिए यह अत्यंत गौरव का विषय है कि अपनी जगत जननी भारत माता ने तात्या टोपे नाम के एक अत्यंत पराक्रमी तथा गौरवशाली क्रांतिकारी को जन्म दिया था। जिसके कौशल्य एवं क्षमता के कारण अंग्रेज लेखकों ने भी इसकी प्रशंसा की है। वह स्वयं न राजा थे न जमीदार थे,न किसी राजा के सेनापति थे परंतु स्वाधीनता संग्राम के नेता श्री नानासाहेब पेशवा का महारानी लक्ष्मी बाई के साथ उनके अभिन्न संबंध थे। प्रखर राष्ट्रभक्ति थी तथा तीनों ने बिठूर में रहकर युद्ध करने के साथ साथ अंग्रेजों पर आघात करके देश को स्वाधीन कराने के उद्देश्य से अनुपम अभ्यास किया था।

तात्या टोपे के बचपन का नाम था रामचंद्र तथा वे महाराष्ट्र के निवासी थे और  उनका जन्म  सन् 1814 में नासिक जिले के मेवाला ग्राम में हुआ था। उनकी माँ  गौरवमई श्रीमति रुकमा बाई और उनके पिता का नाम था श्री पांडुरंग राव भट्ट। नाना साहब पेशवा को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार करने वाले सुप्रसिद्ध बाजीराव पेशवा (अंतिम) के साथ उनके अभिन्न संबंध थे। पुणे नगर में श्री पांडुरंग जी पेशवा जी के साथ पूजा पाठ किया करते थे सन् 1818 में बाजीराव पेशवा के साथ बिठूर आ गए थे। बचपन काल में ही तात्या टोपे ने नाना साहब पेशवा तथा मनु बाई के साथ-साथ घुड़सवारी करना, तलवार, चलाना भाला चलाना विभिन्न शस्त्रों का प्रयोग करना व घुड़दौड़ करना अत्यंत कुशलतापूर्वक सीख लिया था। उनका स्वभाव गंभीर था, बोलचाल कम करते थे। उनकी क्षमता, कुशलता तथा पराक्रम से प्रभावित होकर उन्हें और उत्साह प्रदान करने के लिए श्री बाजीराव पेशवा ने बालक को अपने हाथों से मूल्यवान रत्नों की एक अत्यंत सुन्दर टोपी पहनाकर सम्मानित किया था। इसी कारण उन्हें लोग  टोपे कह कर पुकारने लगे ।इसी आधार पर बालक रामचंद्र का नाम तात्या टोपे के रूप में प्रसिद्ध हो गया। विभिन्न क्षेत्रों में संपर्क रखने के कारण अत्यंत सरलता पूर्वक मराठी, गुजराती, हिंदी, उर्दू भाषाओं में चर्चा वार्ता कर लेते थे। 1842 तक वे मनु के साथ ही बिठूर में रहे थे। उसी कालखंड में मनु का विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव से हो गया था तथा उसका नाम महारानी लक्ष्मीबाई के रूप में  प्रसिद्ध हो गया था। महान क्रांतिकारी तात्या टोपे ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों के साथ मिलकर के अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी थी।

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