बाल संस्कार

*भारतीय काल गणना की वैज्ञानिकता भाग-2*

*श्रुतम्-166*

*भारतीय काल गणना की वैज्ञानिकता भाग-2*

भारतीय साहित्य में संवत प्रारंभ करने की भी शास्त्रीय विधि का उल्लेख मिलता है। अपने नाम से संवत्सर चलाने वाले सम्राट को संवत्सर प्रारंभ करने से पूर्व अपने राज्य के प्रत्येक जन को ऋण मुक्त करना पड़ता है। भारत में महापुरुषों के नाम से महावीर, बौद्ध ,नानक संवत आदि उनके अनुयायियों ने श्रद्धा से प्रारंभ किए होंगे, किंतु सर्वमान्य संवत विक्रम संवत प्रारंभ होने से पूर्व महाराजा विक्रमादित्य ने देश के प्रत्येक व्यक्ति का संपूर्ण ऋण स्वयं चुका कर समाज को उऋण किया था । कहने की आवश्यकता नहीं है कि भारत भूमि के अतिरिक्त किसी अन्य सम्राट ने समाज को उऋण करने का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया हो ।

विक्रम संवत के महीनों के नाम भी वैदेशिक संवतों की भांति देवता मनुष्य अथवा संख्यावाची कृत्रिम नाम नहीं है ,बल्कि आकाशीय नक्षत्रों के उदय अस्त से संबंध रखते हैं । सूर्य व चंद्रमा की कलाओं के अद्भुत संगम के साथ- साथ नक्षत्रों से भी इनकी गहरी साम्यता है। जिस मास में जो नक्षत्र आकाश में प्राय रात्रि से अंत तक दिखाई देता है ,उस मास का नामकरण उसी के आधार पर किया गया है। जैसे चित्रा नक्षत्र से चैत्र मास, विशाखा से बैसाख जेष्ठा से जेष्ठ, मघा से माघ आदि।

संवत्सर मास की तिथियां भी सूर्य चंद्र की गति पर आश्रित हैं तिथियों का क्षरण एवं वृद्धि इस गति चक्र से प्रभावित होती है । यही कारण है कि प्रत्येक 19 वर्ष बाद संवत्सर की तिथि और  सौर वर्ष का दिनांक एक हो जाते हैं। इस प्रकार न केवल ऐतिहासिक प्राचीनता की दृष्टि से बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी संवत्सर सर्वाधिक वैज्ञानिक काल गणना है । दूसरी ओर इस  ईस्वी सन् में फरवरी 28 दिन का, 7 महीने 31 दिन के तथा 4 महीने 30 दिन के हैं जिनका न तो कोई ऐतिहासिक आधार है ना वैज्ञानिक, क्योंकि ईस्वी सन् का प्रारंभ ही ईसा के जन्म के 3 वर्ष बाद माना जाता है। भारतीय साहित्य के अनुसार सृष्टि का प्रारंभ चैत्र शुक्ला प्रतिपदा से होता है। परंपरा के साक्ष्य से हम जानते हैं कि सृष्टि के रचयिता ने इसी दिन ब्रह्मांड की रचना की थी । भारतीय काल गणना के अधिकांश संवत्सर इसी दिन से प्रारंभ होते हैं। खगोलीय दृष्टि से देखें तो भी यह दो खगोलीय पिंडों की कलाओं में पूर्ण सामंजस्य रखते हुए ऐसी ऋतु से प्रारंभ होता है जब सूर्य भूमध्य रेखा पर होता है और पृथ्वी पर वातावरण सर्वथा सम होता है। जबकि  ईस्वी सन् का प्रारंभ एक जनवरी से होता है । उस समय पृथ्वी के दो गोलार्द्धौं में सर्वथा विपरीत ऋतु  रहती हैं। इस प्रकार के पौराणिक, ऐतिहासिक, खगोलीय ,गणितीय तथा वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत श्रेष्ठ और प्रामाणिक वर्ष होते हुए भी पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण में हम अपने स्वत्व को भूलते जा रहे हैं। ढाई सौ वर्ष तक अंग्रेजों की गुलामी तथा स्वतंत्रता पश्चात अंग्रेजी परस्त लोगों के सत्तासीन होने के कारण शिक्षा व्यवस्था में भारतीयता विलुप्त होती गई। परिणाम स्वरूप आत्म परिचय हीनता से उत्पन्न आत्मदीनता ने शिक्षित वर्ग को पाश्चात्यकरण में इस कदर जकड़ लिया कि हमें हमारी प्राचीन परंपरा और संस्कृति पर विश्वास ही नहीं रहा । आज न केवल महानगरों में बल्कि छोटे-छोटे शहरों से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचल तक नववर्ष मनाने का अश्लील और फूहड़ प्रदर्शन 1 जनवरी को होने लगा है । फादर्स डे, मदर्स डे, वैलेंटाइन डे विस्तार पाने लगे हैं। हमारे दैनिक जीवन में हिंदी तिथियों और मासों का महत्व घट गया है।

हम जन्मदिन, विवाह एवं प्रतिष्ठान की वर्षगांठ यहां तक कि अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि भी ईस्वी सन् के दिनांक से मनाने लगे हैं। ऐसा ना हो कि कालांतर में दशहरा 10 अक्टूबर और दीपावली 30 अक्टूबर को मनाने लग जाएं। विगत कुछ वर्षों से राष्ट्रवादी विचार की गतिमान प्रवाहशीलता ने इस विदेशी मानसिकता से निकलने का सार्थक प्रयास किया है।आइए अपना नववर्ष ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि रचना के प्रथम दिन, भगवान राम के राज्याभिषेक का दिन ,शक्ति उपासना का प्रथम दिन, आर्य समाज की स्थापना का दिन, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी , संत झूलेलाल, गुरु अंगद देव और पूज्य डॉक्टर हेडगेवार का जन्मदिन, रवि की फसलों के आगमन के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार दिन तथा महान तेजस्वी सम्राट विक्रमादित्य द्वारा शकों पर विजय का स्मरण दिलाने वाले इस शुभ दिन चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को मना कर गौरवान्वित हों।  इस पावन नव वर्ष का मध्य रात्रि के अश्लील फूहड़पन के स्थान पर भगवान भास्कर के उदय होने पर ब्रह्म मुहूर्त में शंखनाद से स्वागत हो। वसुधैव कुटुंबकम की भावना से विशेष पूजा अर्चना हो, तोरण द्वार एवं बंदनवार लगाएं तथा पारस्परिक बधाइयों से नए वर्ष का अभिनंदन करें।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *