बाल संस्कार

*भक्तों को बचाने के लिए अवतरित हुए थे झूलेलाल*

*श्रुतम्-168*

*भक्तों को बचाने के लिए अवतरित हुए थे झूलेलाल*

¨हिंदू नववर्ष सवंत्सर के चैत्र मास की प्रतिपदा के दिन भगवान झूलेलाल ने अवतार लिया था। इसी दिन से वासंतिक नवरात्र भी शुरू होता है। उनके जन्मोत्सव को चैटी चंद महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। चैटी का अर्थ होता है चैत्र मास और चंद का अर्थ है चंद्रमा। चूंकि प्रतिपदा के दिन चांद नहीं निकलता है, इसलिए इस दिन पैदा होने वाले झूलेलाल को भक्तों ने चैत्र के चांद की संज्ञा दी थी।

कहा जाता है कि सिंध प्रदेश के ठट्ठा नामक नगर में एक मिरखशाह नामक राजा था जो हिंदुओं पर अत्याचार करता था। वह ¨हिंदुओं पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालता था। एक बार उसने धर्म परिवर्तन के लिए सात दिन की मोहलत दी। लोग परेशान होकर सिंधु नदी के किनारे आ गए और भूखे-प्यासे रहकर 40 दिन तक वरुण देवता की उपासना करने लगे। तब प्रभु का हृदय पसीज गया और वे मछली पर दिव्य पुरुष के रूप में अवतरित हुए। भगवान ने भक्तों से कहा कि तुम लोग निडर होकर जाओ मैं तुम्हारी सहायता के लिए विक्रम संवत् 1007 सन 951 ई. में सिंध प्रात के नसरपुर नगर में रतनराय के घर माता देवकी के गर्भ से जन्म लूंगा।

भगवान झूलेलाल का जिन मंत्रों से आह्वान किया जाता है उन्हें ‘लाल साईं जा पंजिड़ा’ कहते हैं। वर्ष में एक बार सतत चालीस दिन इनकी अर्चना की जाती है जिसे ‘लाल साईं जो चाली हो’ कहते हैं। इन्हें ज्योतिस्वरूप माना जाता है।

जन्मोत्सव पर भगवान झूलेलाल की चालीस दिन तक पूजा-अर्चना की जाती है। चूंकि जब उन्होंने अवतरित होने का आश्वासन दिया था तो उसके पहले भक्तों ने चालीस दिन तक सिंधु नदी के किनारे उनकी उपासना की थी।

 

 

 

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