बाल संस्कार

अमरचन्द बाठिया

स्वाधीनता का अमृत महोत्सव

मध्यभारत के गुमनाम नायक (Unsung Heroes) ……

अमरचन्द बाठिया

अमरचंद बाठिया ग्वालियर के राजा जयाजीराव सिंधिया का कोषाध्यक्ष थे। वह एक सभ्य सद्चरित्र और सभ्रांत जैन परिवार से था। अपनी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के कारण वह सिंधिया राज्य के ‘गंगाजली कोष ’ का सदरमुनीम या प्रधान कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया था। यद्यपि अमरचंद बांठिया सिंधिया का कोषाध्यक्ष था, परंतु जब 1857 की क्रांति के समय देशभक्त असहनीय आर्थिक पीड़ा से गुजर रहे थे तब ऐसी स्थिति में उसने अपने क्रांतिकारी नेताओं को सहयोग देना उचित समझा। 22 मई, 1858 ई. को सर ह्यूरोज से पराजित होने के उपरांत महारानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने ग्वालियर से 46 मील दूर स्थित गोपालपुर में विजय हेतु योजना बनाई इस योजना के तहत 31 मई बड़ा गांव में घेरा डालने के उपरांत सभी ने सिंधिया से ग्वालियर प्रदेश के बीच से मार्ग माँगा। सिंधिया उक्त स्थिति को टालना चहाता था, परंतु जब उन्हें ज्ञात हुआ कि क्रांतिकारी सेना संगठित नहीं है, तो वे परिस्थिति का लाभ उठाते हुए अगले दिन 1 जून को 7000 पैदल, 4000 घुड़सवार, 800 बहादुर अंगरक्षकों और 12 तोपों की सेना का नेतृत्व संभालकर क्रांतिकारियों पर आक्रमण हेतु निकल पड़े।

ग्वालियर के सैनिकों में इस युद्ध के प्रति कोई विशेष उत्साह नहीं था, अतः वे युद्ध में केवल दिखावा करते रहे। उनमें से अधिकांश सैनिक क्रांति सेना में मिलकर, अपने राजा सिंधिया के विरुद्ध काम करने लगे। ऐसी स्थिति में महाराजा और दीवान दिनकरराव अपनी सुरक्षा के लिए आगरा अंग्रेजों की शरण में चले गए । उपर्युक्त स्थिति का लाभ उठाकर महारानी लक्ष्मीबाई और तात्याटोपे की सम्मिलित सेना ने ग्वालियर पर विजय प्राप्त की । इसके उपरांत वे शांतिपूर्ण ढंग से सुव्यवस्थित शासन की स्थापना के कार्य में लग गए । नाना साहब को पेशवा, राव साहब को उनका वाइसराय और रामराव गोविंद को प्रधानमंत्री बनाया गया तथा अन्य पदों पर भी विश्वसनीय लोगों को नियुक्त किया गया ।

मेजर मैकफरसन के अनुसार ‘‘1 जून 1857 को क्रांतिकारियों की विजयिनी टुकड़िया जब ग्वालियर में प्रविष्ट हुई तब चारों ओर कुहराम मच गया, किंतु शीघ्र ही राव साहब आदि ने स्थिति को नियंत्रण में ले लिया। इस समय क्रांतिकारियों की स्थिति दयनीय थी। सैनिकों को महीनों से वेतन प्राप्त नहीं हुआ था। अतः 2 जून को राव साहब ने सिंधिया के कोषाध्यक्ष अमरचंद बांठिया को बुलाकर ‘गंगाजली कोष’ से कुछ धनराशि की माँग की। ऐसी स्थिति में अमरचंद सोच में पड़ गये कि यदि वह धन देता है तो स्वामी के साथ विश्वासघात होगा और यदि नहीं देता है तो मातृभूमि की रक्षा शत्रु से कैसे होगी। देश की रक्षा को सर्वोपरि स्थन देते हुए उन्होंने खजाने की चाबियाँ रावसाहब को सौंप दी ।

डॉ . एस.एन. सेन और जॉन  स्मिथ के अनुसार, ‘‘क्रांतिकारी सैनिकों को तीन माह का बकाया वेतन और दो माह का अग्रम दे दिया गया। नरवर में बैजाबाई के सैनिक भी विपन्नता में थे, उन्हें बुलाकर  उनके अश्वारोहियों को पाँच माह की पगार वितरित की गई। रानी लक्ष्मीबाई को 20 हजार, बांदा के नबाव को 60 हजार और राव साहब को 15 हजार की मुहरें उनकी भावी तैयारी हेतु प्रदान की गई थी।

18 जून, 1858 को महाराजा सिंधिया की सहायता से ग्वालियर लोट आए और प्रतिदिन क्रांतिकारियों को फाँसी दी जाने लगी। यद्यपि अमरचंद बांठिया ने शेष राजकोष जयाजीराव को लौटा दिया था फिर भी सिंधिया ने 22 जून, 1858 ई. को अमरचन्द बांठिया को फाँसी की सजा सुना दी। सूरजराज घाड़ीवाला के अनुसार, ‘‘ब्रिगेडियर नेपियर के द्वार चैथे प्रयास में अमरचंद के प्राण लिए जा सके थे। पहला प्रयास ग्वालियर के सर्राफा बाजार में महाराज बाड़े की ओर टपेपी बाजार के मोड़ पर स्थित एक पीपल के वृक्ष पर किया गया, किंतु रस्सी टूटने से वे बच गए। दूसरा प्रयास उन्हें सर्राफा बाजार में ही श्रीनाथ जी के मंदिर के निकट स्थित नीम पर लटकाकर किया गया था, किंतु यहाँ भी रस्सी टूट गई। तीसरी बार सर्राफा बाजार में बारादरी भवन के पास विशाल नीम के वृक्ष पर पुनः प्रयास किया गया, किंतु फंदा टूट गया। तब चैथे प्रयास में नीम पर ही अंततः उन्हें फाँसी दे दी गई और कठोर चेतावनी के रूप में उसका शरीर कुछ दिन (लगभग 3 दिन) तक वहीं लटकाए रखा गया । इस प्रकार यह महान् देशभक्त अपना अविस्मरणीय सहयोग प्रदान कर, फांसी के फंदे पर झूल गया।’’ ग्वालियर के लिये यह एक अविस्मरणीय घटना थी, इस तरह अमरचन्द वास्तव में अमर हो गये ।

 

 

 

 

 

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