बाल संस्कार

महादेव शास्त्री

स्वाधीनता का अमृत महोत्सव

मध्यभारत के गुमनाम नायक (Unsung Heroes) ……

महादेव शास्त्री

सन् 1857 की क्रांति में महादेव शास्त्री ने शस्त्र तो नहीं उठाये लेकिन उन्होंने नाना साहेब पेषवा को जो सहयोग दिया उसके बदले उन्हें फाँसी पर झूलना पड़ा। महादेव शास्त्री ग्वालियर के निवासी थे। उनके पिता का नाम सदाशिव शास्त्री था। महादेव शास्त्री दीवानी अदालत के न्यायाधीश कूपा शास्त्री की अदालत में मुंसिफ थे। 1857 की क्रांति प्रारम्भ होने के समय मुरार छावनी के सैनिकों ने सिन्धिया सरकार तथा अंग्रेज सरकार के खिलाफ क्रांति का रूख अपना लिया था। इस परिस्थिति का लाभ नाना साहब पेशवा ने उठाना चाहा ।

नाना साहब ने इस काम के लिये तात्या टोपे को मुरार छावनी भेजा कि वह मुरार जाकर वहाँ के सैनिकों को अपने पक्ष में कर ले तथा उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति करने हेतु उकसाये। उस समय ग्वालियर में भी क्रांति की गतिविधिया पनप रही थी । उधर महादेव शास्त्री, मुंसिफ होने के नाते, अपनी अच्छी पकड़ बनाये हुए थे। उस समय सिंधिया शासन अंग्रेजी शासन के इशारे पर चल रहा था। ऐसे में अंग्रेज विरोधी महादेव शास्त्री को अपना मन मसोस कर रह जाना पड़ता था, जो उसे असहनीय लग रहा था। अंत में उन्होंने कूपा साहेब की अदालत से इस्तीफा दे दिया और क्रांतिकारी गतिविधियों में संलग्न हो गये। इन्हीं दिनों उनकी शिलंग (तिलंग) निवासी गोविन्द शास़्त्री से मुलाकात हो गयी जो बैजाबाई सिंधिया की प्रेरणा से उज्जैन से ग्वालियर आए हुए थे।

इस व्यक्ति को महारानी बैजाबाई सिंधिया ने उज्जैन से ग्वालियर इस मकसद से भेजा था कि वह मुरार छावनी के सैनिकों को अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति के लिये तैयार करें। ग्वालियर में गोविन्द शास्त्री की मुलाकात महादेव शास्त्री से हो गई। अब दोनों ने मिलकर वही काम करना आरम्भ कर दिया जो महारानी बैजाबाई सिन्धिया चाहती थीं। मुरार छावनी के सिपाहियों को नाना साहब पेशवा के पक्ष में करने का काम बड़ा गोपनीय था तथा हमेशा यह ख्याल रखना पड़ता था कि कहीं उसकी कहीं भनक न लग जाये।

गोविन्द शास्त्री उज्जैन से ग्वालियर आये और वह महारानी बैजाबाई के दामाद पाटनकर के यहाँ नौकरी करने लगे। जब कभी गोविन्द शास्त्री को समय मिलता, वह मुरार छावनी आया- जाया करते थे तथा वह गोपनीय ढंग से छावनी के सिपाहियों को क्रांति हेतु तैयार करते थे। ग्वालियर राज्य के दीवान दिनकर राव एवं ब्रिटिश सरकार के पाॅलीटिकल एजेन्ट मैकफरसन की सांठगांठ के कारण सिन्धिया सरकार भी बेबस थी। इसके बावजूद भी ग्वालियर में क्रांति की जड़ें बहुत पहले से ही जम रही थीं। यह बात उस समय उजागर हुई जब क्रांति के दौरान जून 1858 में लश्कर निवासी भाऊ आप्टे के घर पर, तात्या टोपे रात्रिभोज के लिए गये थे। भाऊ आप्टे तो मालवा के सरसूबा बाबा आप्टे के भाई थे और बाबा आप्टे के पुत्र को नाना साहब पेशवा की पुत्री ब्याही थी।

उस समय छावनी में दो-तीन सौ सवार, जमीदारों के दस हजार आदमी और पुरानी तथा नयी रेजीमेन्ट चार-पाँच हजार आदमी। जब तात्या टोपे सितम्बर 1857 में मुरार आए तब वहाँ महादेव शास्त्री की मुलाकालत तात्या टोपे से हो गयी । नाना साहब पेशवा द्वारा संचालित क्रांति के बारे में आपसी चर्चा भी होती रहती थी। जब तात्या टोपे अपने मिशन को पूरा करने बाद कालपी लौटे तो महादेव शास्त्री भी कालपी चले गये। कालपी में महादेव शास्त्री की मुलाकात नाना साहब पेशवा से हुई और जल्दी ही महादेव शास्त्री नाना साहब पेशवा के विश्वास पात्र बन गये।

तात्या टोपे ने महादेव शास्त्री और गोविन्द शास्त्री के सहयोग से मुरार छावनी के सैनिकों से इतना घनिष्ट संबंध कायम किया कि 28 सितम्बर 1857 को दशहरे के दिन सैनिकों ने तात्या टोपे का भव्य स्वागत किया । उन्होंने परेड के मैदान पर अपनी वर्दी में तैयार होकर तात्या टोपे को पूरी सलामी दी । तात्या टोपे ने इन सैनिकों को ‘ब्रिगेडियर’,‘मेजर’ आदि उपाधियों से विभूषित किया तथा उन्होंने यह भी घोषणा की कि कानपुर पहुँचने पर उन्हें वेतन, भत्ता तथा इनाम भी दिया जायेगा।

उस समय नाना साहब पेशवा बिठूर में रहते थे। पारिवारिक असहमति के कारण इस परिवार इस परिवार के कुछ सदस्य पुनासा (निमाड़) में रहने लगे। पुनासा से, काका फुरकर ने, बेनोर (पुनासा) निवासी नारायण सूर्यवंशी को अपने परिवार को बिठूर से लाने के लिए बिठूर भेजा। उस समय सूर्यवंशी, पुनासा में काका फुरकर के यहाँ ही नौकरी करते थे। बिठूर से वापसी यात्रा में नारायण सूर्यवंशी कालपी रुके। वहाँ वह कपास के पुराने गोदाम के पास ठहर गए। इस तरह उन्होंने कुछ दिन कालपी ही में व्यतीत किये। इन्हीं दिनों उनकी मुलाकात महादेव शास्त्री से हो गयी। दोनों में लम्बी चर्चा हुई। चर्चा के दौरान महादेव शास्त्री ने नारायण सूर्यवंशी को बताया कि वह मालवा अंचल की यात्रा पर जा रहा है। वहाँ उज्जैन में उसकी माँ बीमार है। नारायण सूर्यवंशी भी उधर का (पुनासा-निमाड़) का रहने वाला था और उसे उस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति का अच्छा ज्ञान था। नाना साहब पेशवा को विश्वास हो गया कि महादेव शास्त्री और नारायण सूर्यवंशी कोई भी काम को अंजाम दे सकते हैं। अतः नाना साहब ने महादेव शास्त्री को खुद पत्र दिये जिसे उन्हें मालवा अंचल के राजाओं, जमीदारों, मुखियों आदि को सौंपना था। इन दोनों ने अपने-अपने जूतों के तलों के बीचों-बीच चार पत्र रख लिये तथा शेष पत्र बाँस की एक टोकरी में इस तरह रखे ताकि ये पत्र छिपे रहें। उन्होंने बांस की टोकरी में दोनों परतों के बीच जमा-जमा कर रखे ताकि पता न चला सके कि बाँस की टोकरी में क्या रखा है।

जग्मन्नपुर से पत्र लेकर ये लोग कालपी होते हुए 18 फरवरी 1858 को ईसागढ़ पहुँचे। ईसागढ़ के सूबा गोविन्द नारायण के पास ये दोनों लोग आये । महादेव शास्त्री ने सूबा को बताया कि उनकी माँ उज्जैन में बीमार है और वह अपनी माँ को देखने हेतु ईसागढ़ होते हुए उज्जैन जा रहे है । महादेव शास्त्री ने सूबा गोविन्द नारायण के सम्मान में उसे एक नारियल भेंट किया तथा सूबा से आगे जाने की अनुमति माँगी । महादेव शास्त्री वहाँ से चलकर, ग्वालियर फोर्स की तीसरी कमान के एडजूटेन्ट कल्याण सिंह के पास आये । महादेव शास्त्री ने एडजूटेन्ट को अनेक प्रलोभन दिये और उसे नाना पेशवा के पक्ष में लाना चाहा । लेकिन वह शास्त्री के किसी भी प्रलोभन में नहीं आये। बल्कि उल्टे उसने महादेव शास्त्री की प्रलोभन भरी बातों की जानकारी गुप्त रूप से ईसागढ़ के सूबा गोविन्द नारायण को भेजी।

सूबा गोविन्द नारायण ने इन बातों का सत्यापन करने के लिए महादेव शस्त्री को फिर से अपने पास बुलाया । सूबा ने शास्त्री को बड़े शिष्टाचार के साथ अपने पास बैठाया ताकि वह शास्त्री के मन की बातें समझ सके । कुछ समय बातें करने के बाद सूबा गोविन्द नारायण, महादेव शास्त्री को अलग ले गया? सूबा ने उसे अपनी विश्वसनीयता जताई तथा शास्त्री से कहा, ‘‘मैं तथा एडजूटेन्ट एक ही हैं-’’दो शरीर एक मन, आप निश्चिंत होकर बोलिये । मेरे हाथ में शासन प्रबंध की तथा राजकाज संबंध की शक्ति है । आप चिन्ता न करें, मैं वैसा ही करूँगा जैसा आप कहेंगे । आपका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। इतना कहने के बाद सूबा ने शास्त्री से पूछा, ‘आप कहाँ से आ रहे हैं और अब आप यहाँ (ईसागढ़) से कहाँ  जा रहे हैं। यह तो बतायें कि नाना साहब पेशवा आजकल कहाँ हैं और उनके पास कितनी सेना है। उन्होंने इतना बड़ा काम हाथ में लिया है तो धन की जरूरत तो होती ही होगी, तो नाना इसका प्रबंध कैसे तथा कहाँ से करते हैं। स्वाधीनता अभियान में नाना का सेनापति तात्याटोपे बड़ी ही कुशाग्र बुद्धि का साहसी व्यक्ति है, उसकी योजनाएँ भी सार्थक होंगी, अच्छा जरा उन पर आप प्रकाश डालें तो अच्छी तरह समझ में आ जावेगा।

महादेव शास्त्री ने सूबा गोविन्द नारायण पर विश्वास करते हुए सूबा को बताया, ‘‘गोविन्द शास्त्री 1857 की क्रांति के सिलसिले में उज्जैन से लशकर (ग्वालियर) आये थे। वह लश्कर आकर महारानी बैजाबाई के दामाद पाटनकर के यहाँ ठहर गये तथा वहीं से वह अपने काम में व्यस्त हो गये। काम क्या था? इस बाबत् शास्त्री ने सूबा को बताया कि ‘‘गोविन्द शास्त्री लश्कर आकर, मुरार छावनी के पल्टन के सिपाहियों को, अंग्रेजों के खिलाफ क्रान्ति करने के लिए, तैयार करने लगे। जब सिन्धिया महाराज को इस बात का पता लगा तो महाराज ने गोविन्द शास्त्री को कैद कर लिया । उस समय में भी गोविन्द शास्त्री के साथ उपरोक्त कार्य में संलग्न था।

महादेव शास्त्री ने सूबा को आगे बताया कि इस काम के बाबत् मोरार आया था तथा गोविन्द शास्त्री के साथ कालपी गया था और अक्सर कालपी आया-जाया करता था। उस समय कालपी क्रांति का केन्द्र था उस समय तक कालपी में मुरार छावनी के क्रांतिकारी सिपाहियों की पाँच पल्टनें, तथा अन्य स्थानों से तीन क्रांतिकारियों की पल्टनें कालपी पहुँच चुकी थी। यमुना पार जगमन्नपुर में नाना के भाई बाला साहेब अपनी फोर्स के साथ डटे हुए थे। उस समय कानपुर पर आक्रमण करने की योजना बनाई जा रही थी। महादेव शास्त्री ने नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे की आगे की योजनओं की जानकारी दी ।  पत्रों को गंतव्य तक पहुँचाने के बारे में बताते हुए महादेव शास्त्री ने सूबा को बताया कि उसकी योजना थी कि वह ईसागढ़ से नर्मदा पार (राधोगढ़ सतवास) जाकर वह मालवा के सांेधिया, भीलों, काछियों इकट्ठा करेगा। राधोगढ़ के शासक दौलतसिंह से भी सम्पर्क साधेगा। इसके बाद उसका कार्यक्रम मण्डलेश्वर जाने का था। यहीं पर भील कोर का मुख्यालय था। इस भील पल्टन में दो अंग्रेज अधिकारी तथा एक पंडित था। वहीं पर टेहरी राज्य का अपदस्थ युवराज देवीसिंह भी कैद था जिसे गवर्नर जनरल के एजेन्ट मिस्टर हेमिल्टन ने ओरछा से लाकर यहाँ कैद में डाल रखा था। मण्डलेश्वर में रहकर देवीसिंह ने भी पल्टन के सिपाहियों से अच्छा एवं मधुर संबंध बना रखे थे तथा अपने पक्ष में कर लिया था। यह सब नाना पेशवा को ज्ञात था। अतः देवीसिंह के लिए भी नाना ने एक पत्र महादेव शास्त्री को वितरण करने हेतु दिया था। इसी सिलसिले में महादेव शास्त्री एक पत्र लेकर नाना पेशवा की ओर से पत्र देने हेतु मण्डलेश्वर जा रहे थे तथा उसे नाना ने यह भी काम दिया था कि मण्डलेश्वर पहुँचकर देवीसिंह के यहाँ दोनों अंग्रेज अधिकारियों एवं पंडित का काम तमाम कर दे। इसके अतिरिक्त वहाँ जो दो लाख रूपया का खजाना है उसे भी हथिया ले।

महादेव शास्त्री ने सूबा गोविन्द नारायण को आगे यह भी बताया कि नाना पेशवा का एक पत्र वह राघोगढ़ (वर्तमान में जिला देवास में) के शासक दौलतसिंह के लिये भी ले जा रहा है। इसके पूर्व राघोगढ़ राजा के पास एक पत्र नाना अलगोरे के हाथ भेजा जा चुका है। नाना अलगोरे ग्वालियर नगर के चिटनीस बाजार में रहते थे लेकिन आजकल वह राघोगढ़ में रहते है। राजा दौलत सिंह से यह तय हुआ है कि वह मालवा क्षेत्र के सोधियों तथा काछियों को इकट्ठा किया जाय और उनकी सहायता से मालवा पर अधिकार जमाया जाये। मालवा लेने के बाद मण्डलेश्वर को हथियाया जावेगा। वहाँ टेहरी राज्य (ओरछा राज्य) का अपदस्थ युवराज देवीसिंह कैद में है। उसने मण्डलेश्वर में भी पल्टन को फुसलाकर अपने पक्ष में कर लिया है तथा वहाँ जो दो अंग्रेज आफीसर तथा एक पंडित है उसे तो देवीसिंह ही खत्म कर देगा। यह उल्लेखनीय है कि देवीसिंह को टेहरी (ओरछा) के राजा सुजान सिंह ने गोद लिया था।

राजा सुजान सिंह ने 17 फरवरी 1853 को अपनी मृत्यु के पहले देवीसिंह को अपना उत्ताराधिकारी घोषित किया था। किन्तु सुजानसिंह की मृत्यु के बाद सुजानसिंह की विधवा लड़ई रानी के विरोध के कारण देवी सिंह को गद्दी से हटना पड़ा। अब देवी सिंह तथा उसका पिता हृदयशाह ब्रिटिश सरकार और लड़ई रानी का डटकर विरोध करने लगे। परिणामस्वरूप उन्हें गवर्नर जनरल के एजेन्ट ने गिरफ्तार करके महू छावनी के फोर्ट जेल में रखा और बाद में उन्हें मण्डलेश्वर की जेल में कड़ी निगरानी में रखा गया। बाद में देवी सिंह को घूमने फिरने की छूट मिल गयी और इसका लाभ उठाते हुए उन्होंने वहाँ की भील पल्टन के सिपाहियों से सम्पर्क बढ़ाया। वहाँ वह भील पल्टन के सिपाहियों को अंग्रेजी सरकार के खिलाफ भड़काने में लग गये तथा उस क्षेत्र अन्य वनवासियों में भी ऐसा ही प्रचार करने में लग गये। नाना पेशवा का एजेन्ट बानोर (पुनासा) निवासी नारायण सूर्यवंशी भी देवी सिंह से सम्पर्क बनाये हुए थे ।

नाना साहब पेशवा द्वारा 20 जनवरी 1858 को देवीसिंह को जो पत्र भेजा था उसमें लिखा था ‘‘नारायण सूर्यवंशी द्वारा आपकी प्रार्थना को समझ लिया। आप इन दिनों महू तथा जहाँ भी अंग्रेजी सेना, केवेलरी, भीलकोर एवं अन्य फोर्स तैनात हो आप वहाँ जाकर यूरोपियनों तथा अन्य सभी मददगारों को नष्ट कर दीजिये तथा वापस अपने क्षेत्र में आ जाईये। मैं आपकी मदद करूँगा। आप कृपया बताएँ कि आप कहाँ पर अपने को व्यवस्थित कर रहे हैं। वहाँ पर, मैं, यहाँ से एक व्यवस्थापक भेज दूंगा  ईसागढ़ के सूबा गोविन्द नारायण ने महादेव शास्त्री से पूछा कि वह मालवा में भी राजा प्रमुखों के पास इन पत्रों को कैसे पहुँचायेगें तो महादेव शास्त्री ने बताया कि इन सभी के पास, हम खाज्या नायक के माध्यम से, भील राजा तथा भील प्रमुखों के पास पत्र पहुँचायेंगे।

उपरोक्त काम के लिए नाना पेशवा ने बानौर (पुनासा) निवासी नारायण सूर्यवंशी को मण्डलेश्वर पहले ही भेज दिया था जहाँ सूर्यवंशी ने देवी सिंह तथा अन्यों से सम्पर्क साधकर इस काम को अंजाम दने की योजना को अंतिम रूप दिया था। शास्त्री ने आगे सूबा को बताया, ‘‘ मण्डलेश्वर के बाद, नाना पेशवा की योजना थी महू छावनी पर धावा बोला जाये तथा छावनी को लूटा जाये तथा इस काम में इन्दौर का एक सरदार तथा एक हजार क्रांतिकारी इन्दौर में ंअशान्ति फैला देंगे। नर्मदा पार अंग्रेजों की कुछ रेजीमेन्ट एदलावाद में पड़ाव डाले हुए हैं जिन्हें हम लोग क्रान्ति करने के लिए तैयार कर रहे हैं। ’’  सूबा गोविन्द नारायण से चर्चा के बाद महादेव शास्त्री ने सूबा से कहा, -मैंने जो कुछ आप से कहा है आप उस पर अमल कीजिए। इसके बाद शास्त्री ने उसके समक्ष पच्चीस हजार रूपये की जागीर की सनद का प्रारूप बनाकर प्रस्तुत किया तथा कहा कि वह इस प्रारूप को नाना पेशवा से अनुमोदित करा लेगा । इस वार्तालाप के बाद सूबा ने तुरन्त ही महादेव शास्त्री को 22 फरवरी 1858 को ही पकड़कर बेड़ियों में डाल दिया। शास्त्री तथा सूर्यवंशी की खानातलाशी ली गयी। नारायण सूर्यवंशी को भी पकड़ लिया गया। उपरोक्त सभी पत्र महादेव शास्त्री के पास मिले जिन्हें वह छिपाकर रखे हुए थे। ईसागढ़ के सूबा गोविन्द नारायण ने इन पत्रों को गर्वनर जनरल के एजेन्ट के अपनी रिपोर्ट के साथ प्रेषित कर दिया। इसके बाद एजेन्ट ने इन पत्रों की प्रतिलिपि भारत सरकार के पास भेज दी ताकि सरकार राज प्रमुखों तथा प्रमुख नेताओं की गतिविधियों पर ध्यान रखने के लिए समुचित निर्देश प्रसारित करें ।’’

20 जनवरी 1858 को नाना साहेब पेसवा ने विभिन्न लोगों को जो पत्र लिखकर संबंधित व्यक्तियों को देने हेतु, महादेव शास्त्री को सुपुर्द किये थे और जिन्हें शास्त्री से सूबा ने जप्त किया वे इस प्रकार हैं।  कानेर परगना के जमीदारा मोहब्बत सिंह नेमावर को नाना साहेब ने लिखा- ‘‘यह साफ तौर से जाहिर है कि आप सरकार (नाना पेशवा की सरकार) की सेवा करने के लिए तैयार हैं। जब यह परवाना आपके पास भेजा जाता है कि आप अपने सभी सवारों सहित यहाँ आवें। उन्हें नियमानुसार वेतन दिया जावेगा। रिसालदारों तथा अधिकारियेां को उनके स्तर के मुताबिक मान दिया जावेगा।’’  निम्नलिखित व्यक्तियों के नाम ऊपर की ही इबारत के पत्र लिखे गये- नबाव अमीर उददौला, बूलचंद (रणथम्भोर), मोती सिंह ओमावत (राजगढ़), अलिफ खां जमादार, नबाव मोहम्मद यासीन खां, नबाव मकदूम बख, पिछोर पिपला, दिमान…..सिंह, खिलचीपुर, हीरालाल मोदी, ठाकुर शिवदास सिंह बड़गूजर, रघुनाथ सिंह ओमत, दिमान हनुमंत सिंह नरसिंहगढ़ ।

हिन्दूपत को नाना साहेब ने लिखा – ‘‘हमारे धर्म को अंग्रेज बिगाड़ रहे हैं। अस्तु हमने निश्चय किया है कि उनसे लड़ा जाये। आप राजपूत हैं तथा धर्मावलम्बी भी। अतः मैंने अपने एजेन्ट महादेव शास्त्री को आपके पास भेजा है। आप हमें सैनिक सहायता दीजिए। इन धर्म विरोधी अंग्रेजों का अंत होने पर आपकी इच्छा की पूर्ति हो जावेगी।’’

सभी भील राजाओं को नाना साहेब ने लिखा- ‘‘यह प्रगाढ़ तथ्य है कि आप सरकार (नाना पेशवा की सरकार) की सेवा करना चाहते हैं। अतः आप धर्म विरोधियों का विनाश कर दीजिए तथा अन्य सभी शत्रुओं को भी जो कि उधर के क्षेत्र (राज्यों) में रहते हांे। इसके अलावा यह भी देखिये कि वहाँ अशान्ति न हो। इस पर सरकार (नाना पेशवा की सरकार) आप से अत्यंत प्रसन्न होगी। जब हमारे शत्रुओं का विनाश हो जावेगा तो सरकार (नाना पेशवा की सरकार) स्वयं ही आवेंगे तथा हमेशा के लिए आपको सुप्रबंध कर देंगे।’’

ईसागढ़ सूबा को नाना साहेब द्वारा लिखा गया पत्र इस प्रकार था- ‘‘मुझे इस बात की जानकारी है कि महादेव शास्त्री ने पहले भी आप से जो कुछ कहा है। आप सिन्धिया सरकार की सेना को इस सरकार (नाना पेशवा की सरकार) के पक्ष में कर लेते हैं तथा सिन्धिया के राज्य को हमारे शासनान्तर्गत लाते हैं तो उत्तम है। इस क्षेत्र का शासन प्रबंध तथा अन्य अधिकार आपके पास ही रहेंगे। इसके अलावा आपको पच्चीस हजार रूपये की जागीर हमेशा हमेशा के लिए दी जावेगी। इसके अलावा भी, सिंधिया की सेना के किसी भी भाग पर आपका ही अधिकार रहेगा जिस सेना को आप हमारे पास लाकर हमारे आधीन कर देंगे।’’ महादेव शास्त्री ने जो पत्र ईसागढ़ के एडजूटेन्ट कल्याण सिंह को अपनी ओर से जो पत्र लिखा उसकी इबारत यह है- ‘‘सिन्धिया की जो भी फोर्स आप हमारी (नाना पेशवा ने) सेवा में लाते हैं उस पर आपका ही नियंत्रण रहेगा। हमारी सेना के सिपाहियों, अधिकारियों को जिन नियमों के मुताबिक वेतन, भत्तों आदि मिलते हैं वह सभी आपके द्वारा लाई गयी सिन्धिया फोर्स को भी मिलेगा।’’ सूबा गोविन्द नारायण ने महादेव शास्त्री की गिरफ्तारी के बाद उपर्युक्त सभी पत्र आगे की कार्यवाही के लिए ले लिये।

महादेव शास्त्री तथा नारायण सूर्यवंशी की गिरफ्तारी पर सेन्ट्रल इंडिया के एजेन्ट ने भारत सरकार को अपने 26 मार्च 1858 के पत्र में लिखा, ‘‘नाना पेशवा के दो क्रांतिकारी नेताओं को ईसागढ़ के सूबा ने रोक लिया है। वह इन्हें कैद करके मेरे कैम्प पर भेज दे’’ एजेन्ट इन क्रांतिकारी नेताओं की गिरफ्तारी पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए आगे लिखता है, ’’ईसागढ़ के निम्नलिखित अधिकारियों के काम की सराहना की जाती है। वे हैं- वे हैं-ईसागढ़ का सूबा गोविन्द नारायण, कल्याण सिंह एडजूटेन्ट, राजाराम भाऊ दफादार ये सभी लोग सिन्धिया सरकार की सेवा में हैं। इन व्यक्तियों के प्रशंसनीय कार्य के लिए निम्न प्रकार से इन्हें पुरस्कृत करने की अनुशंसा की जाती है- गोविन्द नारायण सूबा को 350 रूपये, कल्याण सिंह एडजूटेन्ट को 186 रूपये 12 आना और राजाराम भाऊ दफादार को 190 रूपये ।

26 मार्च 1858 को सेन्ट्रल इंडिया एजेन्ट का मुकाम, झाँसी के पास, झाँसी मार्ग पर था। वहीं पर इसने महादेव शास्त्री तथा नारायण सूर्यवंशी के वकीलों के सामने इन दोनों के बयान लिये। क्रांति के मामले में इन्हें पूर्णतया दोषी सिद्ध होने पर इन दोनों को फाँसी की सजा सुनाई गयी। इन्हें 6 मार्च 1858 को फाँसी दे दी गयी। फांसी के समय उनके वकील भी उपस्थित थे। ये वकील काफी संतुष्ट थे तथा इन्होंने मामले में दिलचस्पी ली। उपरोक्त कार्यवाही की सूचना ग्वालियर के पाॅलीटिकल एजेन्ट ने भारत सरकार के पास पहली अप्रैल 1858 को प्रेषित कर दी। फाँसी के समय महादेव शास्त्री की आयु पैंतीस वर्ष की तथा नारायण सूर्यवंशी की आयु चालीस वर्ष की थी ।

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