बाल संस्कार

 बेघर के लिए घर

*श्रुतम्-214*

 *बेघर के लिए घर*

 

सन 1970 के दशक के मध्य की बात है। एक दिन 8 वर्ष का एक अनाथ बालक मिला। उसे गोवा में मालगाड़ी के डिब्बे में अकेला छोड़ दिया गया था। कई दिन बीत गए और जब कोई भी व्यक्ति उस बालक को लेने नहीं आया तो विश्व हिंदू परिषद से जुड़ी एक महिला उस बालक को अपने घर ले गई। इस प्रकार परित्यक्त बच्चों को घर  प्रदान करने का विचार जन्मा।

ईसाई मिशनरी तो पहले से ऐसे अनेक केंद्र चला रहे थे। स्वाभाविक था कि उन केंद्रों में पलने वाले बच्चे ईसाई बने। विहिप द्वारा गोवा में स्थापित *मातृ-छाया* संभवत: हिंदुओं का प्रथम ऐसा बाल आश्रम था।

अपनी माता से बिछड़े बच्चे के लालन-पालन की कठिन परीक्षा की तो केवल कल्पना ही की जा सकती है। किंतु महिला कार्यकर्ताओं के समर्पित कर्मठ दल ने मातृ छाया को सड़कों पर परित्यक्त बच्चों के लिए स्नेह, सांत्वना और ममता का सरस सागर बना दिया है। मात्र एक-दो दिन के नवजात परित्यक्त शिशुओं को भी यहां ले लिया जाता है। केंद्र में जाने वाली महिलाएं तो इन्हें देखकर विशेषतः द्रवित हो जाती है। वे कहती हैं- हम माताएं हैं हमें पता है कि बच्चों को पालने का काम कितना कँटीला, कोमल करुण और कष्टदायक होता है। हम तो अपने एक दो बच्चों को पालने में ही थक जाती है और यहां तो 1 महिला 10 बच्चों की मां है। फिर भी वह कितने सुव्यवस्थित स्नेह भाव से उनका लालन-पालन कर रही है। हर नवागत बच्चे का यहां परंपरागत रीति से स्वागत वंदन किया जाता है। धार्मिक नामकरण संस्कार होता है। हर बच्चे का जन्म दिवस मनाया जाता है। कुछ बड़े बच्चों के लिए शिशु सुलभ कविता, साधारण नृत्य और खेल होते हैं। प्रातः स्मरण और भजन होते हैं। विभिन्न तीज त्यौहार और वन विहार के कार्यक्रम होते हैं।

परिवार की ही भांति यहां रीति रिवाज चलते रहते हैं।

अन्य स्थानों में भी ऐसी मातृछाया चलाई जा रही है। बेंगलुरु में यह *अनाथ शिशु निवास* नाम से संचालित है।

कर्नाटक विश्व हिंदू परिषद बेलगांव, सकलेशपुर मंगलौर और पुचूर में ऐसे केंद्र चला रही है।

मुंबई में *वात्सल्य* है। विदर्भ में यवतमाल में एक ऐसा ही केंद्र है। दिल्ली तथा कुछ अन्य प्रांतों में भी मातृ छाया है।

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