बाल संस्कार

 51 शक्तिपीठ

श्रुतम्-305
 51 शक्तिपीठ

भारतवर्ष भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से एक रहा है।  समय-समय पर विकसित उपासना पद्धतियों से इसकी एकात्मता अधिक पुष्ट हुई है।  विभिन्न पन्थों के पवित्र तीर्थ समस्त राष्ट्र में फैले हुए हैं। संपूर्ण भारत भूमि उनके लिए पवित्र है। शैव मतावलम्बियों के प्रमुख तीर्थ आसेतु हिमाचल सभी दिशाओं में फैले हैं। शक्ति के उपासकों के  पूज्य तीर्थ शक्तिपीठ भी इसी प्रकार सर्वर दूर एकात्मता का संदेश देते हैं।  इनकी संख्या 51 है ।

तंत्र चूड़ामणि में 53 शक्तिपीठों का वर्णन किया गया है, परंतु वामगंड (बायाँ कपोल) के गिरने की पुनरुक्ति हुई है, अतः 52 शक्ति पीठ रह जाते हैं। *प्रसिद्धि 51 शक्तिपीठों* की ही है। शिवचरित्र, दक्षायणी तंत्र एवं योगिनी-हृदयतंत्र में 51 ही गिनाए गए हैं।

एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा के अनुसार आद्या शक्ति ने प्रजापति दक्ष के घर*जन्म लिया। प्रजापति दक्ष ने अपनी इस पुत्री का नाम सती रखा। बड़ी होने पर सती ने पति रूप में शिव की प्राप्ति के लिए तप* किया। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने सती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया और कैलाश पर जा विराजे।

कुछ समय पश्चात प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस आयोजन में दक्ष ने भगवान शिव को छोड़कर सभी देवों  और देवियों को आमंत्रित किया। पिता के यहां यज्ञ होने का समाचार पाकर भगवती सती बिना निमंत्रण के ही पिता के घर जा पहुंची।

यज्ञ में शिवजी की उपेक्षा को सती सहन न कर सकी और योगबल से प्रदीप्त अग्नि में प्राण त्याग दिए। समाचार मिलने पर शिव क्षोभ से भर गए।  दक्ष यज्ञ को नष्ट कर सती के शव को कंधे पर रखकर शिवजी उन्मत्त हो घूमते रहे।

सर्वदेवमय परमेश्वर विष्णु ने *शिव-मोह-शमन तथा साधकों की सिद्धि एवं कल्याण के लिए* सुदर्शन चक्र द्वारा सती के शव के विभिन्न अंगों को भिन्न-भिन्न स्थानों पर गिरा दिया।  जहां-जहां वे अंग गिरे, वहीं वहीं शक्ति पीठ स्थापित हुए।

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